Thursday, June 27, 2013

KUCH KHAS


पैगम्बरों व वलियों के मामलात को समझना बड़ी बात है। हमारे सिलसिला-ए-आलिया के बानी मुबानी हुजूर सैय्यदना अब्दुल हई शाह साहब र.अ. आलिम व मुफ्ती थे। आप फरमाते कि जाहिरी इल्म (फलसफा)
की मोटी-मोटी पेचीदा किताबों को समझने व याद करने में मुझे कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई, लेकिन जब बातिनी इल्म यानि तसव्वुफ को समझने की कोशिश की तो मेरा सारा पढ़ा लिखा, तसव्वुफ के समुन्दर के सामने पानी की तरह बह गया। राहे तरीकत यानी रूहानी इल्म जो दुनिया के तमाम इल्मों का सरताज है। इसे पढ़ लिखकर हासिल नहीं किया जा सकता। यह तो पीर के दिल से मुरीद के दिल में मुन्तक़िल (ट्रांसफर) होता है। कहते हैं कि जिस आदमी के दिल में खुदा की मोहब्बत का शौक पैदा हो जाये तो उसे चाहिए कि वह जल्द अज़ जल्द तरीकत के पीर की तलाश करे। मजहबे इस्लाम के परिन्दे के दो बाजू हैं। एक शरीयत व दूसरा तरीक़त या तसव्वुफ है। शरीयत आलिमों से सीखना होता है और तरीकत या तसव्वुफ रूहानी आलिम यानि पीर से सीखना होता है। यह इल्म सीना बा सीना पीर से मुरीद के दिल में मुन्तक़िल (ट्रांसफर) होता है। हजरत इमाम मालिक ने फरमाया है, जिसने शरीयत व तसव्वुफ दोनों सीखा वह मुहक्किक है यानि सच्चा है। हुजूर स.अस. ने फरमाया, गुस्सा, लालच, घमण्ड और तरह-तरह की ख्वाहिशों को काबू में रखकर, रूह के आईने को पाक साफ कर उसमें खुदा का दीदार करना तसव्वुफ है। तमाम रूहानी बीमारियों का इलाज तरीकत के पीर के पास है। पैगम्बरों के बाद इस इल्म को सिखाने वाले अल्लाह तआला के दोस्त वलील्लाह हैं। जिनसे मुरीद को वही फ़ैज़ (फायदा) हासिल होता है जो उम्मतियों को पैगम्बर अ.स. से हासिल होता है। हुजूर स.अ.स. हयातुन्नबी हैं और जिंदा है। क़यामत तक आप अपने नायेबीन व वारिसीन के रूप में अपनी उम्मत की रहबरी फरमाते रहेगें। हुजूर स.अ.स. की हदीसों का यह मफहूम है कि मेरी उम्मत के औलिया अल्लाह पैगम्बरों के वारिस हैं। हदीसों से जाहिर होता है कि पीर से मुरीद को वही फायदा पहुंचता है जो पैगम्बरों से उम्मतियों को पहुंचता रहा है। कुरआने पाक व हदीसे पाक में जगह-जगह अल्लाह वालों की पैरवी की हिदायत दी गई है। अल्लाह तआला फरमाता है कि मोमिन-मोमिन का आईना है। पीर जो खुदा का दोस्त होता है, उसको देखकर मुरीद बातिनी सूरत ठीक कर सकता है। पैगम्बर स.अ.स. की जगह पीर मुरीद के लिए एक नमूना (आदर्श) है। अच्छों की सोहब्बत से, उनकी दुआ से इन्सान अच्छा हो जाता है। पीर की तवज्जो से आदमी तरक्की कर इंसाने कामिल बनकर फनाफिल्लाह होकर हमेशा बाकी रहने वाला हो जाता है। मौलाना रूम फरमाते हैं कि पीर के मुंह से खुदा बोलता है। पीर का हुक्म खुदा का ही हुक्म होता है। पीर मुरीद की जान व मंजिले मकसूद होता हैं। इसलिए हर पल पीर का अदब व ऐहतराम करना चाहिए। पीर के लिए जितनी अकीदत व मोहब्बत जिसके दिल में जितनी ज्यादा होगी अल्लाहतआला की बारगाह में उसका मर्तबा वैसा ही बढ़ता जायेगा। नमाज जैसी अफजल इबादत में यकसुई (एकाग्रता) पैदा करने और दिल की सफाई करने का ईलाज पैगम्बरों व वलियों के पास ही है। यही इल्में तसव्वुफ है। रूहानी इल्म या तसव्वुफ खुदा की नजदीकी से हासिल होता है। यह इल्म अल्लाह की तरफ से दिलों में डाला जाता है। यह इल्म नबूवत का साया है, विरासत है। पीर अपनी रूहानी ताकत से मुरीद के दिल को पाक-साफ करके उसमें बस जाता है। पीर के पर्दे में मुरीद को हुजूर सअ.स. और अल्लाह तआला के जलवए मोहरतम का दीदार होता है। पीर के वसीले से खुदा तक पहुंचा जाता है, जो दोनों जहानों की सआदत से बढ़कर है। पीर की वजह से ही इंसान का शैतानी खसलत रखने वाला नफ्स फरिश्तों जैसी खसलत अख्तियार करके खुदा व उसके रसूल सअ.स. से राजी व मुतमईन हो जाता है। इस इल्म के जानने वाले को सूफी कहते हैं जो खुदा से फानी और खुदा के साथ बाकी होता है।शरीयत को बुजुर्गों के तौर तरीके पर अमल करके उसकी हकीकत को हासिल करना तसव्वुफ है। बादाम शरीयत है, उसका गुदा तरीकत है और तेल हकीकत है। इस रास्ते पर चलने वाले जिस्म को साफ रखने के साथ-साथ दिल को गुनाहों की गंदगी से पाक-साफ कर खुदा को उसमें बसा लेते हैं। इस तरह शरीयत इमारत की मजबूत नींव है।तरीकत मकान है और मकान से जो आराम मिलता है हकीकत है। ‘‘इल्मेतसव्वुफ ‘इस्लाम की रूह’ है। एक बुजुर्ग फरमाते हैं कि सूफी वह है जो पैग़म्बर हज़रतइस्माईल अ.स. जैसे फर्माबरदार (आज्ञाकारी) हो, जो खुदा का हुक्म मानते हुए अपने वालिद के हाथों जिबह होने को तैयार हो गये थे। पैगम्बर हजरत अय्यूब अ.स. की तरह बड़ी से बड़ी मुसीबतों में सब्र का दामन हाथ से न छोड़े और खुदा की याद करते रहें। हजरत मूसा अस.की तरह खुदा की राह में जौक व शौक से चले व इबादत करें और हजरत मोहम्मद स.अ.स. जैसा बेहतरीन आदतों व बरताव करने वालाबने। इन सब पैगम्बरों के तरीके को अपनाना तसव्वुफ है। सूफी का खुदा के सिवा कोई इलाह (पूज्य) नहीं होता। खुदा को पाने के सिवा उसका कोई मकसद नहीं होता। खुदा के सिवा उसका कोई महबूब (प्रिय) नहीं होता और उसके लिए दुनिया में खुदा के सिवा कोई मौजूद नहीं होता। वह एक को सब में और सबको एक में देखता है। सूफीज्म का उद्देश्य नई पीढ़ी को मजहबे इस्लाम व इसकी रूहानी ताकत को दिखाना है, ताकि अगली नस्लें दीन के रास्ते पर चलकर हिन्दुस्तान व सारी दुनिया में अमन (शान्ति) का पैगाम दें।
तसव्वुफ ;ैनपिेउद्ध ।तइपब ूंतक (अरबी शब्द) तसव्वुफ इस्लाम की रूहानी, ;डलेजपबंसद्ध रहस्यमयी सतहों को दिखाने वाला या प्राप्त करने वाला एक आन्दोलन है। इस राह पर चलने वाला सूफ़ी कहलाता है। सूफ़ी स्कालर्स सूफिज़्म को एक विज्ञान के रूप में देखते हैं जिसका उद्देष्य दिल को खुदा के सिवा हर चीज़ से अलग रखना है। अहमद इब्ने अजीबा एक सूफ़ी दार्षनिक ने परिभाषित किया है-
‘‘सूफिज़्म एक विज्ञान है जिसके द्वारा इन्सान खुदा की (एक ईष्वरवाद) वहदानियत के अन्दर अपना सफर करता है, अपनी रूह को पाक करता है (गन्दगी से) और कोषिषों से इसे खूबसूरत बनाता है। ज़िक्र-अज़कार, तसव्वुर के मारेफत-तरक्की करके खुदा-पाक के दीदार करता है।’’
सूफिज़्म का उदगम ;म्जलउवसवहल ंदक वतपहपदद्ध इसका शब्दिक अर्थ है;ैंंिद्ध सफा जिसका मतलब है साफ-सुथरा दूसरा अर्थ है ;ैनद्धि सूफ यानी ऊन ष्ॅभ्व्व्स्ष् जिसका मतलब सादा कपडो से है जिसे बुज़रूगाने दीन पहना करते थे।
।ीस ंे.ैनििंी (अ़हल अज़ सुफफा) ष्ज्ीम चमवचसम व िठमदबीष् वे लोग जिन्हंे अव्वल सफ लाइन में जगह दी गई। ये वे लोग हैं जो असहाबीये-रसूल हैं और हुजूर के वकत में अपना वकत ज़िक्र अज़कार में गुजारते थें। अबू रयाअन अल-बिरूनी इरानी स्कालर ने इस शब्द को यूनान ;ळतममाद्ध शब्द से लिया है ष्ैवपिंष्जिसका अर्थ है बुद्धि, अक़ल इत्यादि।
सूफ़ी खुदा की मुहब्बत और उसकी मौजूदगी से अपना सफर तय करता है। सूफिज़्म का रूहानी नियम गुनाहों से तौबा, चरित्र की बुरी बातों का त्याग, अपनी रूह को सदगुणों व अच्छे चरित्र से सजाना है। खुदा पाक का ध्यान, स्वअनुषासन और उसकी मोहब्बत से इन्सान को उसका कुर्ब (नज़दीकी) हासिल हो जाती है।खुद को भूलना पड़ता है तभी खुदा पाक का कुर्ब हासिल होगा।
‘‘जब गुम किया अपने तई,
दिलदार को पाया।’’
सूफिज़्म कुरआन पाक और हज़रत मोहम्मद के इष्के इलाही से वाबस्तां (सम्बन्धित) है। खुदा पाक की मुहब्बत से शरीअत, तरीक़त मारेफत व हक़ीक़त क रास्ते तय किये जाते है। इस्लामिक कल्चर (ंसंस्कृति) पर सूफिज़्म का प्रभाव रहा है और रहेगा।
मुराकिबा
अल्लाह पाक के 99 नामों में से एक नाम है ‘रक़ीब’ जिसका मतलब है ‘‘निगहबान’’ टपहपसंदज मुराकबा से इन्सान अपने यार का जल्वा देखता है, अपनी रूहानी ताकत बढाता है और हमेषा अल्लाह पाक की मौजूदगी का एहसास करता है। गये दषकों ;त्मबमदज क्मबंकमेद्ध में पष्चिमीं देषों में नव सूफिज़्म ;छमू ैनपिेउद्ध का प्रसार हुआ है। ;न्दपअमतेंस ैनपिेउद्ध सर्वव्यापी सूफिज़्म आन्दोलन, ;ज्ीम ळवसकमद ैनपिेउ ब्मदजतमद्ध सुनहरा सूफ़ी केन्द्र, सूफ़ी फाउन्डेषन ऑफ अमेरिका ;ैनपि थ्वनदकंजपवद व ि।उमतपबंद्धए ;ज्ीम छमव.ैनपिेउ व िप्कतपे ैींीद्ध इदरीस शाह का नवीन सूफिज़्म, ;ज्ीम प्दजमतदंजपवदंस ।ेेवबपंजपवद व िैनपिेउद्धए सूफिज़्म की अर्न्तराष्ट्रीय संस्था, ;ज्ीम ैनपिेउ त्म.वतपमदजमकद्ध सूफिज़्म पुनर्रचना।
अमेरिका में ‘रूमी शाह’ ;त्नउप ैींीद्ध की रचनाएँ खूब पढ़ी जा रही हैं। ;ज्ीम प्ेसंउपब प्देजपजनजम पद डंददीमपउद्ध मानहीम शहर में इस्लामिक इन्सटीट्यूट । जर्मनी में यह माना जा रहा है कि सूफिज़्म अन्तर्जातीय समन्वय, अन्तर-संस्कृति मिलन आपके भोतिकवादी युग में एक सुनहरा आन्दोलन है।

0 comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.

SHAH-E-ROOMI